विंसन विंसन भणि अजर जरीलौ, अै जीवण का मूलूं ।। जांभोजी की वाणी
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May 24, 2025
आइए गुरु महाराज जांभोजी द्वारा प्रतिपादित शब्दों पर लाइव विचार मंथन करें प्रतिदिन।
निवण-प्रणाम:
भले ही आज मानव भूमण्डलीय और तकनीकी के युग में जी रहा है। परन्तु मानवीय संवेदनाएं सृष्टि सृजन के साथ ही आई। मगर कालांतर में यह कितनी बचेंगी कह नही सकते, परन्तु महापुरुषों की दार्शनिक व आध्यात्मिक बातें हमें हमेशा मानवता का पाठ पढ़ाती रहेगी ऐसा जानकारों का मानना हैं। ओर इसका इतिहास भी गवाह हैं।
इसी कड़ी में जांभाणी लाइव भी अपना एक छोटा सा प्रयास शुरु करने जा रहा है। वो प्रयास हैं, विश्नोई धर्म प्रवृतक श्री गुरु महाराज जांभोजी की वाणी का भिन्न-भिन्न तरीके से प्रचार-प्रसार करना । चाहे वो डिजिटल हो या जमीनी स्तर पर सगौष्टी के रुप में, आप सभी के शुभाशीष व गुरु महाराज जांभोजी की कृपा से अपना परचम जरुर लहरायेगा।
जांभाणी साहित्य धारा की एक बहुत बड़ी विशेषता यह रही है, कि यह दो शताब्दियों तक जनश्रुतियों में रहने के बावजूद भी जांभाणी साहित्य मानवीय गुणों व परिणामों की दृष्टि में अत्यंत समृद्ध हैं।
जांभाणी साहित्य की यह धारा हवा के साथ बहने वाली नहीं है। इतिहासकार बताते हैं कि हिन्दी साहित्य में जिस समय रीतिकाल की धूम हो गई थी और भक्तिधारा को कुंद मान लिया गया था, उस समय भी जांभाणी काव्यधारा अपने उन्हीं पूरे वेग के साथ जनश्रुति के रुप में बहती रही, जो गुरु महाराज जांभोजी ने प्राणी मात्र के लिए बना कर गये थे। पंद्रहवीं सदी के भक्ति आंदोलन के बाद धीरे-धीरे जिस रीतिकाल में कवियों ने अपनी कलमें ओर काव्य रचानाए दरबारों में जाकर बेच दी थी और थैलियों में खनकते सिक्कों की आवाज उनके लिए कभी तलवारों की टनक तो कभी पायलों की खनक बन गई थी, उस विषम समय में भी जांभाणी कवि सुदूर रेतीले धोरों के बीच झोंपड़ियों में पेट बांधे भगवान के गीत लिख काव्य रचनाएं तैयार रहे थे। ओर अब जब भी उनके इस अवदान का मूल्यांकन होगा तो रीतिकाल पर भी पुनर्विचार जरुर होगा । आज भी जांभाणी साहित्यकार उन्हीं मूल सिद्धान्तों पर अडिग हैं, जिनको लेकर भक्ति आंदोलन आगे बढ़ा था। ऐसे महापुरुषों के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास अब डिजिटल रुप से “जांभाणी लाइव” टीम की ओर से किया जायेगा । जिसमें आप सभी का सहयोग अपेक्षित हैं।