भक्ति (Bhakti) एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है पूर्ण प्रेम, समर्पण और श्रद्धा यह ईश्वर या किसी उच्च शक्ति के प्रति आत्मा की गहरी आस्था और लगाव को दर्शाता है। जांभाणी दर्शन में “भक्ति” को मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का एक प्रमुख मार्ग माना गया है — इसे भक्ति मार्ग कहते हैं।
भक्ति के मुख्य तत्व:
प्रेम और समर्पण: भक्ति में भक्त अपने पूरे मन, वचन और कर्म से भगवान को समर्पित रहता है
निस्वार्थता: इसमें किसी भी प्रकार की स्वार्थ भावना नहीं होती, केवल भगवान की कृपा और दर्शन की अभिलाषा होती है।
स्मरण और जप: नाम-स्मरण (ईश्वर के नाम का जप) भक्ति का महत्वपूर्ण साधन है।
कीर्तन और भजन: भगवान की महिमा का गायन भक्ति का सरल और प्रभावशाली रुप है।
सेवा: भगवान और उनके भक्तों की सेवा भी भक्ति का एक रुप है।
अब समझिए भक्ति के प्रकार:
1. सगुण भक्ति: जब ईश्वर को मूर्ति या साकार रुप में पूजा जाता है (जैसे राम, कृष्ण, शिव,)
2. निर्गुण भक्ति: जब ईश्वर को निराकार, निरगुण ब्रह्म के रूप में माना जाता है (जैसे संत कबीर और गुरु नानक, जांभोजी की भक्ति)
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